लोकतंत्र पर कोरोना का प्रभाव

आज भारतीय लोकतंत्र के समक्ष कई चुनौतिया खड़ी हो गयी है| आपातकाल, वैश्विक महामारी, भुखमरी, स्वास्थ्य सुविधा में कमी जैसी समस्या हमारे देश के लोकतंत्र के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नही है| ऐसा पहली बार नही हुआ है कि देश ने इस प्रकार की चुनौतियों का सामना न किया हो परन्तु कई बार इन समस्याओं का समाधान मिला है और कई बार इन चुनौतियों से लम्बे समय तक जूझना पड़ा है| कोरोना जैसी वैश्विक महामारी आज हमारे लोकतंत्र को भयानक चुनौती दे रही है यह समस्या ऐसी है जिससे अल्पकाल में समाधान नहीं पाया जा सकता है| लम्बे समय से पूरा विश्व इस महामारी जैसी समस्या से लड़ रहा है| 

भारतीय लोकतंत्र भी इस महामारी से लड़ रहा है| सरकार अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए कई भरसक प्रयास कर रही है लेकिन अचानक आई आपदा के दोरान यदि कोई फैसला लिया जाता है तो वह पूरी तरह कारगर सिद्ध नहीं हो पाता है लेकिन काफी हद तक स्थितियो पर काबू पाया जा सकता है| जिसका उदाहरण हम कोरोना महामारी के संकट के समय लगे जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन के रूप में देख सकते है| लॉकडाउन और कोरोना संकट का सबसे ज्यादा प्रभाव मजदूर बनाम मजबूर वर्ग पर पड़ा है| एक तो कोरोना महामारी दूसरा लोकडाउन के कारण भुखमरी और स्वास्थ्य समस्या जैसी मार को मजदूर वर्ग और निम्नवर्ग जूझ रहा है| आवास, भोजन और स्वास्थ्य सुविधा जैसी मूलभूत सुविधाओं को देश के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुचाने में सरकार चाहकर भी सक्षम नहीं हो पा रही है | कोरोना से जीतने के लिए सरकार द्वारा जो भी कदम उठाय जा रहे है मजदूर और गरीब वर्ग को उसका भरपूर लाभ नही मिल पा रहा है | कोरोना के आरंभिक समय में मजदूर वर्ग की स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गयी थी | हजारों की संख्या में मजदूरो और गरीबो का सडको पर उतर जाना अपने राज्य में वापिस जाने की मांग करना ,सुविधा न मिलने पर मीलो पैदल ,भूखे-प्यासे लगातार चलते रहना यह दर्शाता है कि हमारे लोकतंत्रीय सरकार से कही तो कमी रह गयी थी जिसका खामियाजा इन लोगो को इस प्रकार भरना पड़ रहा है | कुछ समय बाद सरकार द्वारा आश्वासन देने के बाद भी जनता ने पलायन करना ही उचित समझा है | ऐसा पहली बार हुआ है कि एक बड़ी संख्या में मजदूर वर्ग अपनी जन्मभूमि की ओर पलायन करने को मजबूर हो गया है| मजदूरों के एक साथ सडको पर आ जाने से सरकार के सामने एक और समस्या कड़ी हो गयी थी वह है  इन मजदूरो को इनको घर वापिस कैसे पहुचाया जाये ? उपर से महामारी फैलने का भय भी साथ चलता रहता है| इसके लिए सरकार ने जो योजनाये बनाई उनके बारे में सही जानकारी इस तबके को उपलब्ध नही हो सकी | मजदूरों के लिए चलाई गयी ट्रेनों का किराया इतना अधिक था जो कि इनके सामर्थ्य से बाहर है | भारत में मध्यकाल से ही पूंजीवाद का भयानक दृश्य देखा जाता रहा है शोषक वर्ग की मानसिकता सामंतवादी रही है| जिसके पास उचित और उससे अधिक सुविधा और साधन उपलब्ध है वह इस महामारी में अभिलाषा पूर्ण जीवन जी रहे है लेकिन अपने से निम्न वर्ग की उपेक्षा कर रहे है | कई मकान मालिक द्वारा किरायदारों को घर से निकाल देने की घटनाए इस बात को प्रमाणित करती है | कि आज भी गरीब और मजदुर वर्ग का जीवन संघर्षपूर्ण ही है आज भी इन्हें हाशिये पर रखा जाता है | इन सभी समस्याओं से जूझते हुए आँखों में आंसू लिए पेट की आंतों को सिकोड़ कर हजारो की संख्या में ये मजबूर लोग लोकतंत्र को चुनौती देते हुए अपने घर लौट रहे है | इस महामारी का निवारण कब और कैसे यह आज भी चुनौती के रूप में लोकतंत्र के समक्ष खड़ा है कब तक? यह प्रश्न आज भी वैसा ही है|

by KM ANITA (PHD Scholar)

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *